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एक रात में बना ये शिव मंदिर, पर पूरा न हो सका जानिए रहस्य

एक रात में बना ये शिव मंदिर, पर पूरा न हो सका जानिए रहस्य

मध्यप्रदेश में ऐतिहासिक धरोहरों की कमी नहीं है, जिनका महत्व धार्मिक और पुरातत्व दोनों ही दृष्टिकोणों से है। आज हम आपको एक ऐसे ही स्थान की ओर ले जा रहे हैं। कहा जाता है कि इसका निर्माण एक रात में पूर्ण नहीं हो सका। इसलिए मंदिर को अधूरा छोड़ दिया गया। विशालकाय शिव मंदिर देखकर लोग अवाक रह जाते हैं। इसे दुनिया का सबसे ऊंचा मंदिर भी कहा जाता है। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 32 किलोमीटर की दूरी पर रायसेन जिले में स्थित यह मंदिर उत्तर भारत का सोमनाथ कहा जाता है। यह भोजपुर से लगती हुई पहाड़ी पर एक विशाल, किन्तु अधूरा शिव मंदिर है।

भोजेश्वर महादेव अपने आप में एक अनूठा शिव मंदिर है। इसका निर्माण सिर्फ एक रात में किया गया था। और इसे अधूरा भी सिर्फ इसलिए छोड़ दिया गया क्योंकि निर्माण होते-होते सुबह हो गयी थी। हालांकि इसके पीछे के स्पष्ट कारण के बारे में कोई नहीं जानता। इसकी लम्बाई 18 और व्यास 7.5 फुट है। विशेषज्ञों की मानें यह अधूरा मंदिर दुनिया में सबसे निराला है यदि पूर्ण होता तो सिर्फ इसकी अलौकिकता की कल्पना ही की जा सकती है।

स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना

यह मंदिर वर्गाकार है, जिसका बाह्य विस्तार बहुत बडा़ है। मंदिर चार स्तंभों के सहारे पर खड़ा है और देखने पर इसका आकार किसी हाथी की सूंड के समान लगता है। यहां मौजूद शिवलिंग दुनिया का सबसे विशाल शिवलिंग है, जो कि एक ही पत्थर से निर्मित है। इस मन्दिर की विशालता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसका चबूतरा 35 मीटर लम्बा है। इस विशालकाय देवालय के सम्पूर्ण शिवलिंग की लम्बाई 18 फीट और व्यास लगभग 8 फीट का है। यदि सिर्फ शिवलिंग की ऊँचाई लें, तो भी यह अकेले 12 फिट ऊंचा है। काफी प्राचीन होने के कारण यह शिवलिंग छत का पत्थर गिरने से खंडित हो गया था। जिसे पुरातत्व विभाग ने जोड़ कर पुनर्स्थापित कर दिया था

जनश्रुतियों के अनुसार

मंदिर और इसमें मौजूद शिवलिंग की स्थापना धार के प्रसिद्ध परमार राजा भोज द्वारा की गई थी। परन्तु स्थानीय मान्यता के अनुसार माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण  पांडवों द्वारा माता कुंती की पूजा के लिए किया गया था। कुछ अन्य जनश्रुतियों के अनुसार सूर्यपुत्र कर्ण को कुंती ने मंदिर नजदीक बहने वाली बेतवा नदी के इसी तट पर विसर्जित कर दिया था। 11वीं शताब्दी में परमार वंशीय राजा भोजदेव ने भगवान शिव की प्रेरणा द्वारा पुनर्निर्माण करवाया था।

80-80 टन के विशाल स्ट्रक्चर्स

इस विशाल मंदिर में प्राचीरों पर 80-80 टन के विशाल स्ट्रक्चर्स की उपस्थिति आपको दाँतों में उंगली दबाने को मजबूर कर सकती है। बगैर मशीनों और विद्युतीय यंत्रों के ये कैसे सम्भव हो सका! इस प्रश्न का उत्तर है,दरअसल मंदिर के पश्च भाग में बना ढलान बनाया गया है, जिसका उपयोग निर्माणाधीन मंदिर के समय विशाल पत्थरों को ढोने के लिए किया गया था। यह निर्माण का अपने आप में दुर्लभतम नमूना है। इस मंदिर का दरवाजा किसी हिंदू भी इमारत के दरवाजों में सबसे बड़ा है।

इस शिव मंदिर के गर्भगृह के ऊपर बनी अधूरी गुम्बदाकार छत भारत की प्राचीन स्थापत्य कला के कई राज खोलती है। ग्यारहवीं शताब्दी के इस मंदिर की गुंबदनुमा छत इस्लामी स्थापत्य कला के भारत से प्रभावित होने की संभावना भी दर्शाती है। क्योंकि इस मंदिर के निर्माण के काफी सालों बाद ही इस्लामी राज भारत आया था। इसे भारत की सबसे पहली गुम्बदीय छत वाली इमारत के रूप में भी जाना जाता है।

श्रद्धालुओं का हुजूम

भोजेश्वर महादेव मंदिर में साल में दो बार मकर संक्रांति व महाशिवरात्रि पर्व के समय वार्षिक मेलों का आयोजन किया जाता है। ये आयोजन स्थानीय प्रशासन द्वारा कराये जाते हैं, जिसमें सिर्फ भोपाल या आस-पास के ही नहीं, पूरे देश से श्रद्धालुगण पहुँचते हैं। मन्दिर से कुछ दूरी पर बेतवा नदी के किनारे पर माता पार्वती की गुफ़ा है। श्रद्धालुओं में इस गुफा के प्रति बेहद भक्तिभाव देखा जा सकता है। गुफ़ा नदी के दूसरी तरफ है, इसलिये नदी पार जाने के लिए नौकाएं उपलब्ध हैं।

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