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मौत को महसूस करना चाहतें हों तो यहाँ आइये

मौत को महसूस करना चाहतें हों तो यहाँ आइये

जब जिंदगी से सारी उम्मीद ख़त्म हो जाती है मौत को गले लगाना पड़ता है। ऐसा मानना है साउथ कोरिया की एक संस्था का जो आत्महत्या की प्रवृत्ति वाले लोगों के उपचार का काम करती है। उपचार की इस नई विधि के तहत मरीजों को लकड़ी के ताबूतों के अंदर बंद कर दिया जाता है ताकि उन्हें मृत्यु का अनुभव हो सके।

नकली मौत के बाद जिंदगी को देते हैं ज्यादा महत्व

सियोल स्थित हयॉवों हीलींग सेंटर का मानना है कि इस नकली मौत के बाद उनके विद्यार्थी जिंदगी को ज्यादा महत्व देने लगते हैं। साउथ कोरिया में आत्महत्या की दर काफी तेजी से बढ़ रही है। एक अनुमान के अनुसार इस देश में रोजाना 40 लोग खुदकुशी कर लेते हैं। हयॉवों हीलींग सेंटर में समाज के हर वर्ग से लोग आते हैं जिसमें किशोर, उम्रदराज माता-पिता और बुजुर्ग लोग शामिल हैं। जहां किशोर स्कूल में दबाव झेलने में असफल हो रहे हैं वहीं बुजुर्ग को अकेलेपन हो जाने का डर सताता है। वे अपने परिवार पर आर्थिक बोझ नहीं बनना चाहते हैं।

मुसीबतों से भागने के बजाए उन्हें स्वीकार करें

हीलींग सेंटर में आने वाले सभी लोगों को सफेद चोगा पहनाया जाता है और फिर कतार में रखे ताबूतों के अंदर बैठा दिया जाता है। उनके हाथ में पेन और पेपर भी दिया जाता है। इसके बाद जियोंग योंग मुन उनसे थोड़ी देर तक बात करते हैं और उन्हें समझाते हैं कि मुसीबतों से भागने के बजाए उन्हें जिंदगी के एक हिस्से के तौर पर स्वीकार करना चाहिए और कठिन परिस्थितियों का भी आनंद लेना चाहिए। मजेदार बात ये है कि जियोंग योंग मुन पहले लोगों का अंतिम संस्कार करवाते थे।

जिंदगी के सूनेपन को करते हैं अनुभव

जियोंग योंग मुन अपने विद्यार्थियों को पहले ताबूत में लिटा देते हैं और उनकी अंतिम संस्कार वाली तस्वीर भी खींची जाती है। इसके बाद वे अपनी वसीयत लिखते हैं और अपनों को विदाई पत्र भी। जब मृत्यु का समय आता है तब विद्यार्थियों को कह दिया जाता है कि अब जीवन के उस पार जाने का समय आ गया है। मोमबत्तियां जलाई जाती हैं और मृत्यु की देवी कमरे में प्रवेश करती हैं। विद्यार्थी अपने ताबूत में फिर एक बार लेटते हैं और मृत्यु की देवी उनके ताबूतों को बंद कर देती हैं। करीब 10 मिनट के लिए उन्हें अकेला छोड़ दिया जाता है, उस दौरान वे जिंदगी के बाद के सूनेपन का अनुभव करते हैं। अंत में जब वे ताबूत से बाहर आते हैं तो तरोताजा और मुक्त महसूस करते हैं। यह पूरा अनुभव विद्यार्थियों को यह एहसास दिलाता है कि मृत्यु को चुनकर वे अपने चहेतों को कितना तकलीफ पहुंचाएंगे।

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